20 मार्च 2025 (सीमांत की आवाज )
लखनऊ विश्वविद्यालय में मनमानीपूर्ण गैरकानूनी नियुक्तियां
लखनऊ विश्वविद्यालय में चहेतों को रेवड़ी बाँटने की तर्ज पर गैरकानूनी नियुक्तियों के मामले बदस्तूर जारी हैं. ताजा मामला पर्यटन अध्ययन संस्थान का है जहाँ नियमों को धता बताते हुए निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर अपात्र और अनर्ह व्यक्ति की तैनाती कर दी गयी है.
भारत में विश्वविद्यालयों की नियामक संस्था यूजीसी के नियमों के अनुसार किसी भी विश्वविद्यालय में निदेशक पद पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम अर्हता सम्बंधित क्षेत्र में प्रथम श्रेणी में डिग्री के साथ डाक्टरेट डिग्री और 15 वर्ष का अध्यापन, अनुसंधान या उद्योग में प्रोफ़ेसर पर पर कार्य करने का कम से कम पांच वर्ष या उससे अधिक का अनुभव अनिवार्य है. (स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार- संलग्नक 1 व् 2)
इन न्यूनतम निर्धारित अर्हताओं को ताक पर रख कर लखनऊ विश्वविद्यालय के पर्यटन अध्ययन संस्थान में निदेशक पर पर ऐसे व्यक्ति की तैनाती कर दी गयी है, जिसके पास प्रोफ़ेसर पर का न्यूनतम पांच वर्षों का अनुभव तो दूर की बात, सहायक प्रोफ़ेसर पर भी जिसकी नियमित नियुक्ति भी कभी नहीं हुई. खबर है कि उनके चयन और नियुक्ति के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय में भी कोई रिकार्ड ही उपलब्ध नहीं है. चर्चा है कि डॉ अनुपमा श्रीवास्तव की नियुक्ति मूल रूप में कान्ट्रेक्ट के आधार पर हुई थी और आज तक सहायक प्रोफ़ेसर पद पर भी उनकी नियुक्ति नियमित नहीं है.
विश्वविद्यालय की ही वेबसाईट में ही डॉ अनुपमा श्रीवास्तव को पर्यटन अध्ययन संस्थान के निदेशक के रूप में प्रदर्शित किया गया है, जबकि उसी पृष्ठ में उन्हें सहायक प्रोफ़ेसर भी बताया गया है. (संलग्नक: 3) स्पष्ट है कि वह कभी प्रोफ़ेसर पद पर नहीं रहीं और न ही उन्हें प्रोफ़ेसर पद पर पांच वर्ष का अनुभव है. विश्वविद्यालय द्वारा इस नियुक्ति को इतना गोपनीय रखा गया है कि इसका कोई औपचारिक नोटिफिकेशन भी जारी नहीं किया गया है. यह स्व वित्त पोषित पाठ्यक्रम चलाने वाले विश्वविद्यालय के पर्यटन अध्ययन संस्थान के विद्यार्थियों के साथ विश्वविद्यालय का छल माना जा रहा है.
खबर है कि प्रदेश के विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की फर्जी तैनातियों की भरमार है. लखनऊ विश्वविद्यालय में ही ज्यादातर विभागों के निदेशक तो प्रोफ़ेसर हैं, जबकि कुछ विभागों में चहेतों को अनर्ह होने के बावजूद निदेशक पर पर तैनाती दे दी गयी है. उल्लेखनीय है फर्जी नियुक्तियों के मामले विधान सभा के मौजूदा सत्र में भी उठाये जा चुके हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया. आखिर कब तक होगी कार्यवाही